

16 मई/ DPH NEWS
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि भारतीय कानून में किसी भी व्यक्ति को अपने केस में अदालत के सामने पेश होकर अपनी बात रखने का अधिकार है. मतलब, अगर मामला आपका है, तो आप अदालत से अनुमति लेकर अपना पक्ष खुद रख सकते हैं. इसके लिए कानून की डिग्री का होना जरूरी नहीं है. लेकिन एक बात बहुत साफ है. अपना केस खुद लड़ना और वकील के रूप में पेश होना, दोनों अलग बातें हैं. अगर आप सिर्फ अपने मामले में बोल रहे हैं, तो अदालत कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे सकती है, लेकिन अगर आप वकील की तरह पेश होना चाहते हैं, तो फिर अलग कानूनी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं
मामला आपका होना चाहिए:
सबसे पहली शर्त यही है कि मुकदमा आपसे जुड़ा हो. आप अपने लिए बोल सकते हैं, लेकिन सामान्य तौर पर दूसरे व्यक्ति का केस आप नहीं लड़ सकते.
अदालत की अनुमति जरूरी:
अदालत में जाकर केवल इतना कह देना काफी नहीं कि मैं खुद बहस करूंगा. इसके लिए आपको अदालत से अनुमति लेनी पड़ती है. कई जगह लिखित आवेदन देना होता है.
अदालत की प्रक्रिया का पालन करना होगा:
अगर आप खुद केस लड़ रहे हैं, तो आपको कुछ जरूरी बातें समझनी होंगी. याचिका या जवाब कैसे दाखिल होता है? दस्तावेज कैसे लगाए जाते हैं? तारीख पर क्या कहना है? किस अदालत की क्या प्रक्रिया है? किस भाषा और किस शिष्टाचार में बात करनी है? अदालत भावनाओं से नहीं, रिकॉर्ड और कानून से चलती है.
आप दूसरे की ओर से वकालत नहीं कर सकते:
यही सबसे अहम सीमा है. अगर आप किसी दूसरे व्यक्ति के लिए बहस करना चाहते हैं, तो फिर आपको विधिवत अधिवक्ता होना पड़ेगा.
वकील की तरह पेश होने के लिए अलग शर्तें हैं:
यदि कोई नेता, नागरिक या कानून स्नातक अदालत में अधिवक्ता की तरह पेश होना चाहता है, तो जरूरी है कि आप किसी बार काउंसिल के सदस्य हों. आपके पास अदालत में प्रैक्टिस करने का प्रमाण-पत्र हो. यदि पहले किन्हीं वजहों से प्रैक्टिस रुकी हो तो उसकी स्थिति साफ हो. सुप्रीम कोर्ट में नियमित फाइलिंग के लिए एडवोकेट ऑन रिकार्ड की व्यवस्था भी अलग है. यहीं से ममता बनर्जी के मामले में विवाद शुरू हुआ.
