GK:जानिए, सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का कैसे पड़ा नाम

28 अप्रैल/ DPH NEWS

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट ऐवरेस्ट की कहानी भी दिलचस्प है. ज्यादातर लोग इसे इसी नाम से जानते हैं, लेकिन इसका पुराना नाम कुछ और था. यही नहीं, इसे तिब्बत और नेपाल में अलग-अलग नामों से जाना जाता है.सबसे ऊंचा पर्वत…दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत कहलाने वाला माउंट ऐवरेस्‍ट रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है. इसकी ऊंचाई लगभग 8,848.86 मीटर, जो इसे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी बनाती है. हिमालय पर्वतमाला में नेपाल से तिब्‍बत तक फैले माउंट ऐवरेस्‍ट को हमेशा से इसी नाम से नहीं जाना गया. इसका पुराना नाम कुछ और है. माउंट ऐवरेस्‍ट का पुराना नाम…. आज दुनिया के इस सबसे ऊंचे पर्वत को माउंट ऐवरेस्‍ट कहा जाता है, लेकिन इसका पुराना “पीक XV (Peak XV)” था. इसे यह नाम इसकी ऊंचाई के कारण मिला था. 19वीं सदी में जब ब्रिटिश सर्वेक्षण के दौरान इसकी ऊंचाई मापी कई तो इसे Peak XV कहा गया. इसके नाम को बदलने का काम 1865 में हुआ. इसका नाम सर जॉर्ज ऐवरेस्‍ट के सम्‍मान में बदलकर माउंट ऐवरेस्‍ट रखा गयाकैसे बदला नाम… 4 जुलाई 1790, इंग्लैंड में जन्‍मे सर जॉर्ज ऐवरेस्‍ट एक ब्र‍िट‍िश सर्वेयर और भूगोलविद् थे. उन्‍होंने ग्रेस्‍ट ट्र‍िग्‍नोमेट्र‍िकल सर्वे को और आगे बढ़ाया. इसे भारत की सबसे बड़ी मैपिंग परियोजनाओं में गिना गया. इसकी मदद से भारत की जमीन, पहाड़ों और सीमाओं को बहुत सटीक तरीके से मापा गया. उनके काम ने आधुनिक भारत के नक्शे की नींव रखी. यही वजह थी कि उनके सम्‍मान में माउंट ऐवरेस्‍ट नाम रखा गया. इसका सबसे पुराना नाम पीक XV था. इसके बाद इसे सर जॉर्ज ऐवरेस्‍ट के सम्‍मान में माउंट ऐवरेस्‍ट नाम दिया गया. यही नहीं, नेपाल में माउंट ऐवरेस्‍ट को सागरमाथा कहा जाता है. वहीं तिब्‍बत में इसे चोमोलुंगमा कहते हैं.पहली बार माउंट ऐवरेस्‍ट पर चढ़ाई चढ़ने वाले एडमंड हिलेरी और तेंजिंग नॉर्गे थे. उन्‍होंने 1953 में चढ़ाई की थी और उनकी उपलब्‍ध‍ि पर्वतारोहण के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है. वर्तमान में दुनियाभर के सैकड़ों पर्वतारोही यहां चोटी को फतह करने पहुंचते हैं, लेकिन यह चढ़ाई बेहद कठिन और जोखिमभरी होती है. यहां का तापमान माइनस 60 डिग्री सेल्‍सियस तक गिर सकता है.यहां के 8 हजार मीटर से ऊपर वाला हिस्‍सा डेथ जोन कहलाता है. यहां पर ऑक्‍सीजन की मात्रा बहुत कम होती है और इंसान के लिए जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है. इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर पर्वतारोही थकने लगते हैं और कई बार जान का जोखिम भी उठाते हैं.

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