


2 जून/DPH NEWS
सार
माउंट एवरेस्ट पर जब भी मौतें होती हैं तो आस्था, विश्वास, आर्थिक कमजोरी, खराब मौसम आदि वजहों से लोग यह कठिन फैसला करते आ रहे हैं. आइए, अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट डे के बहाने जानते हैं कि एवरेस्ट पर कितनी ऊंचाई पर है डेथ जोन? यह कैसे बढ़ाता है मौत का खतरा? एवरेस्ट तक पहुंचने के रूट क्या हैं? कैसे जाते हैं, कब जाते हैं, कहां से अनुमति लेते हैं?
विस्तार
एवरेस्ट पे पर्वतारोही डेथ जोन में चले जाते हैं क्या है इसका कारण आईए जानते हैं बीते पांच साल में कितने लोग गए? इमरजेंसी की स्थिति में कैसे मदद पहुंचती है?29 मई को दुनिया भर में एवरेस्ट डे मनाया जाता है.
साल 1953 में एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने पहली बार माउंट एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचकर इतिहास रचा था.
एवरेस्ट सिर्फ एक पहाड़ नहीं है. यह साहस, तैयारी, अनुशासन और धैर्य की सबसे बड़ी परीक्षा है. लेकिन यह उतना ही खतरनाक भी है. यहां मौसम पल में बदल जाता है. ऑक्सीजन बहुत कम हो जाती है. शरीर जवाब देने लगता है. इसलिए एवरेस्ट पर चढ़ाई को दुनिया की सबसे कठिन चुनौतियों में गिना जाता है.माउंट एवरेस्ट पर जब भी मौतें होती हैं तो आस्था, विश्वास, आर्थिक कमजोरी, खराब मौसम आदि वजहों से लोग यह कठिन फैसला करते आ रहे हैं. आइए, अंतर्राष्ट्रीय एवरेस्ट डे के बहाने जानते हैं।
एवरेस्ट पर कितनी ऊंचाई पर है डेथ जोन? यह कैसे बढ़ाता है मौत का खतरा? एवरेस्ट तक पहुंचने के रूट क्या हैं? कैसे जाते हैं, कब जाते हैं, कहां से अनुमति लेते हैं?
माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8,848.86 मीटर मानी जाती है. यह पृथ्वी की सबसे ऊंची चोटी है. यह नेपाल और तिब्बत, यानी चीन, की सीमा पर स्थित है. नेपाल में इसे सागरमाथा कहा जाता है. तिब्बत में इसे चोमोलुंगमा कहा जाता है. पूरी दुनिया के पर्वतारोही यहाँ हर साल जाते हैं.माउंट एवरेस्ट पर लगभग आठ हजार मीटर के ऊपर का इलाका डेथ जोन कहलाता है. यही वह ऊंचाई है, जहां शरीर को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता है. यहां हवा में ऑक्सीजन बहुत कम होती है. इंसान सामान्य तरीके से सांस नहीं ले पाता. शरीर की ताकत तेजी से गिरती है. दिमाग की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है. इसलिए यहां ज्यादा देर रुकना जानलेवा हो जाता है. जो लोग एवरेस्ट फतह करते हैं, वे भी बहुत देर तक वहां नहीं रुकते.डेथ जोन मौत का खतरा क्यों बढ़ाता है?डेथ जोन में शरीर धीरे-धीरे बंद होने लगता है. सांस तेज चलती है, लेकिन शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती. इससे चक्कर, उलझन, थकान और फैसला लेने की क्षमता कमजोर होने लगती है. कई बार फेफड़ों में पानी भरने लगता है. इसे हाई एल्टीट्यूड पल्मोनरी एडिमा कहा जाता है. दिमाग में सूजन भी आ सकती है. इसे हाई एल्टीट्यूड सेरेब्रल एडिमा कहते हैं. हाथ-पैर सुन्न पड़ सकते हैं. ठंड, तेज हवा, बर्फ, लंबी कतार और थकान मिलकर हालात और खराब कर देते हैं. इन वजहों से पर्वतारोही कई बार संकट में आ जाते हैं.
