

सार
क्या आप जानते हैं कौन था वह राजा जिसने बनाई थी भारत देश में पहली नहर आईए जानते हैं जानकारी अनुसार भारत की पहली नहर कौन सी थी? यह कब बनी थी और इसे किस राजा ने बनवाया था? अगर नहीं जानते तो बता दें कि आज से करीब 2000 साल पहले, जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में लोग नदी के पानी को नियंत्रित करना भी नहीं जानते थे, तब दक्षिण भारत में एक राजा ने पानी की धारा को मोड़कर भारत की सबसे पहली नहर का निर्माण कर दिया था.
विस्तार
क्या आप जानते हैं कौन था वह राजा जिसने बनाई थी भारत देश में पहली नहर आईए जानते हैं जानकारी अनुसार भारत की पहली नहर कौन सी थी? यह कब बनी थी और इसे किस राजा ने बनवाया था? अगर नहीं जानते तो बता दें कि आज से करीब 2000 साल पहले, जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में लोग नदी के पानी को नियंत्रित करना भी नहीं जानते थे, तब दक्षिण भारत में एक राजा ने पानी की धारा को मोड़कर भारत की सबसे पहली नहर का निर्माण कर दिया था. यह राजा थे महान चोल सम्राट करिकाल, जिन्हें उनकी दूरदर्शिता और वास्तुकला के प्रति प्रेम के लिए जाना जाता है.
लगभग 150 ईस्वी में जब पश्चिमी दुनिया इंजीनियरिंग की बुनियादी परिभाषाएं सीख रही थी, तब चोल राजवंश के इस पराक्रमी राजा ने तमिलनाडु के तंजावुर में कावेरी नदी के उफनते और तेज बहाव वाले पानी के बीच ‘कल्लनई बांध’ का निर्माण कर पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया था.
कल्लनई का शाब्दिक अर्थ ही ‘पत्थर का बांध’ होता है. इसी बांध से भारत का पहला ग्रैंड एनीकट नहर निकला. यह आज भी न केवल पूरी तरह सुरक्षित है, बल्कि इसके जरिए लाखों एकड़ फसलों को पानी भी दिया जा रहा है!महान राजा करिकाल चोल के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मानसून के दौरान कावेरी नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ तंजावुर के उपजाऊ डेल्टा क्षेत्रों को पूरी तरह तबाह कर देती थी, जबकि गर्मियों के दिनों में यही इलाका पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस जाता था. इस समस्या का समाधान निकालने के लिए करिकाल चोल ने नदी के पानी को नियंत्रित और डायवर्ट करने की एक शानदार योजना बनाई. उन्होंने त्रिची (तिरुचिरापल्ली) से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक ऐसी जगह को चुना, जहां कावेरी नदी दो हिस्सों में विभाजित होती थी. तब इसके उत्तरी शाखा को कोल्लीडम और दक्षिणी शाखा को कावेरी कहा जाता था. कोल्लीडम का ढलान तेज होने के कारण बाढ़ का सारा पानी वहां बह जाता था, जबकि खेती के लिए महत्वपूर्ण कावेरी नदी सूखी रह जाती थी. ऐसे में राजा ने अपनी सूझबूझ से बहती नदी के बीचों-बीच पत्थर रखकर पानी के प्रवाह को मोड़ा और वहां से नहरों का एक ऐसा जाल बिछाया, जिसने पूरे क्षेत्र की तकदीर बदल दी.इस बांध के निर्माण की वास्तुकला और तकनीक इतनी जबरदस्त है कि आधुनिक वैज्ञानिक और हाइड्रोलिक इंजीनियर्स भी इसे देखकर दंग रह जाते हैं. आज से दो हजार साल पहले बिना किसी सीमेंट, कंक्रीट, गारे या आधुनिक मशीनों के इस भव्य ढांचे को पूरी तरह से केवल बिना तराशे गए कच्चे पत्थरों से तैयार किया गया था. चोल काल के इंजीनियरों ने ‘इंटरलॉकिंग टेक्नोलॉजी’ का इस्तेमाल किया था, जिसमें पत्थरों को इस तरह एक-दूसरे में फंसाकर नदी के तल पर बिछाया गया कि वे पानी के भयंकर दबाव को आसानी से झेल सकें. नदी की रेतीली सतह पर पत्थरों को स्थिर रखने के लिए उन्होंने पहले विशालकाय पत्थरों को पानी में डुबोया और जब वे रेत में पूरी तरह धंस गए, तो उनके ऊपर भारी चट्टानों की परतें बिछाई गईं.
यह बांध लगभग 329 मीटर (1,079 फीट) लंबा, 20 मीटर (66 फीट) चौड़ा और 5.4 मीटर ऊंचा है,
जिसका घुमावदार डिजाइन और ढलान वाली चोटी पानी के बहाव को आसानी से नियंत्रित करती है और गाद को भी जमा नहीं होने देती!