
न्यू दिल्ली/ DPH NEWS
2027 का इलेक्शन आने से सभी राजनीतिक पार्टियों में अपना टकली मची हुई है अब देखना यह है कि कौन सी पार्टी 2027 के चुनाव में बाजी मारेगी, इसी बीच भाजपा और अकाली दल का गठबंधन क्या कांग्रेस और आपके लिए हो सकता है नुकसानदेह इसका फैसला तो देश की जनता ही करेगी जानकारी के अनुसार पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां अभी से तेज हो गई हैं. सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा तो यह भी है कि करीब 25 साल पुराने दोस्त फिर साथ आ सकते हैं. भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चा तब से तेज हुई है जब सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई. हालांकि, दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है.अकाली दल इस समय बीजेपी के साथ गठबंधन करने की कोशिश तो कर ही रही है, लेकिन इसके साथ-साथ उसे दो और वोटबैंक फिर अपनी ओर आकर्षित करने होंगे. एक तो पंथक वोटबैंक और दूसरा रहा जाट वोटबैंक. पंजाब की राजनीति में एक समय ऐसा था जब ये दोनों ही वोटबैंक अकाली की सबसे मजबूत नींव हुआ करते थे. लेकिन बदलते समीकरणों ने जाट वोटरों में बिखरा किया और बेअदबी और गोलीकांड जैसे विवादों ने पंथक वोटबैंक को भी अकालियों से दूर कर दिया.असल में राज्य की लगभग 58 फीसदी सिख आबादी में से 20 से 25 फीसदी मतदाता धार्मिक मुद्दों को मतदान का आधार बनाती है, इसी आबादी को पंथक समाज कहा जा रहा है. लेकिन 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी और बहबल कलां पुलिस गोलीबारी कांड ने अकाली दल की चुनौती बढ़ा दी और उसका सियासी ग्राफ गिरता चला गया. आंकड़ों में बात करें तो 2017 विधानसभा चुनाव में अकाली दल का वोट प्रतिशत मात्र 25.24 फीसदी रह गया था और उसे 15 सीटें मिलीं. 2022 में गिरावट और बड़ी देखने को मिली और वोट शेयर 18.38 फीसदी पहुंच गया और सीटें मात्र तीन. जानकार मानते हैं कि पंथक वोटर का एक बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी, वारिस पंजाब दे और शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) को जा रहा है.इसी तरह पंजाब में अधिकांश कृषि भूमि पर वर्तमान में जाटों का नियंत्रण है और वे राज्य में हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं. जाट पंजाब की कुल आबादी का 35 से 40 फ़ीसदी हिस्सा हैं और वे सबसे बड़े जाति आधारित समूह के रूप में पहचान रखते हैं. एक समय यह वोटर भी अकाली दल का सबसे मजबूत हिस्सा हुआ करता था, लेकिन अब यहां भी बिखराव हुआ है. ऐसे में अकाली दल को अगर वापसी करनी है तो सिर्फ बीजेपी से गठबंधन करने से बात नहीं बनेगी, अपने पारंपरिक वोटबैंक को भी वापस हासिल करना होगा
