
09 मई/ DPH NEWS
भारत की राजनीति ने कई प्रभावशाली महिला नेताओं को देखा है. इस सूची में तीन महिलाओं जे. जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी का ज़िक्र भी ज़रूरी है, जो क्षेत्रीय ताक़त से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में रहीं और उन्होंने राजनीति को दिशा दी.दृढ़ता, सशक्त नेतृत्व और मतदाताओं के साथ मज़बूत जुड़ाव के बल पर, वे राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय राजनीति का निर्णायक चेहरा बन गईं.उन्होंने एक ऐसे राजनीतिक अखाड़े में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जिस पर लंबे समय से पुरुषों का वर्चस्व रहा था.साल 2016 में जयललिता के निधन और हाल के वर्षों में मायावती के वर्चस्व के कमज़ोर पड़ने के साथ, ममता बनर्जी को एकमात्र कद्दावर महिला नेता माना जाने लगा था. उन्होंने अपने दम पर अपनी पार्टी खड़ी की और उसे सफलता दिलाई.माफ़ी चाहते हैं, हम इस स्टोरी का कुछ हिस्सा लाइटवेट मोबाइल पेज पर नहीं दिखा सकते.हालाँकि, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली ताज़ा हार के बाद, यह सवाल बना हुआ है कि क्या भारत की इन ‘आख़िरी महिला योद्धाओं’ का अध्याय अब समाप्त हो गया है?बीजेपी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में 207 सीटों के साथ एक ज़बरदस्त जीत हासिल की है. जबकि ममता बनर्जी अपनी सीट भी बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से हार गई हैं.शुभेंदु अधिकारी ने बनर्जी के गृह क्षेत्र भवानीपुर विधानसभा सीट से 15,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की.इस चुनाव परिणाम ने भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप पर बहस को फिर से तेज़ कर दिया है. ख़ास तौर पर ममता बनर्जी के घटते प्रभाव को लेकर, जो वाम मोर्चा के 34 साल लंबे शासन को समाप्त कर साल 2011 में बंगाल में सत्ता में आई थीं.हालाँकि, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख अपनी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. मंगलवार शाम को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया, “हमारी हार नहीं हुई है. मैं इस्तीफ़ा नहीं दूँगी.”स्वतंत्रता आंदोलन की नेता सुचेता कृपलानी जो बाद में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, से लेकर देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक, कई महिला नेता लंबे समय से भारत की राजनीतिक यात्रा का एक अहम हिस्सा रही हैं.इंदिरा गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को उस मुश्किल दौर से बाहर निकाला, जो महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से भरा था. यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें विपक्ष की बहुत सी आलोचना झेलनी पड़ी.उनके कार्यकाल में कई बड़ी घटनाएँ भी हुईं, जिनमें पाकिस्तान के साथ साल 1971 का युद्ध, चीन के साथ संघर्ष और विवादित इमरजेंसी का दौर शामिल है. फिर भी, वह एक मज़बूत महिला राजनेता के तौर पर उभरीं, और उन्होंने भविष्य की महिला नेताओं के लिए रास्ता बनाया.
