
काठमांडू/DPH NEWS
क्या पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की तरह बालेन शाह भारत के साथ सीमा विवाद को अगले लेवल पर ले जाना चाहते हैं? बालेन शाह की सरकार ने भारत से जमीनी रास्तों से आने वाले 100 रुपये से ज्यादा की कीमत वाले सामानों पर कस्टम ड्यूटी लगा दिया है। ये फैसला अप्रत्याशित लग सकता है लेकिन ये फैसला बालेन शाह के डर की कहानी है। यह एक ऐसे देश की कहानी है जिसने अपने ही नागरिकों से डरना शुरू कर दिया है। यह सिर्फ नीति में बदलाव नहीं है बल्कि यह प्राथमिकताओं का पतन है। नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर ने काठमांडू पोस्ट में लिखे अपने कॉलम में ये बातें कही हैं।उन्होंने बालेन शाह की आलोचना करते हुए लिखा है कि नेपाल-भारत की खुली सीमा, जिसे वर्षों से ‘रोटी-बेटी संबंध’ ने जिंदा रखा था और दोनों देश रोजमर्रा की जिंदगी में गुंथे हुए हैं, उन दोनों देशों की सीमा आज सत्ता में बैठे लोगों की नजर में एक ‘खतरा’ बन गई है। उन्होंने आगे लिखा है कि ‘जब कोई देश अपने ही लोगों को खतरा समझने लगता है तो उसे समझ आ जाता है कि समस्या सीमा पर नहीं बल्कि शासन-प्रशासन में ही है।’ उन्होंने कहा है कि नेपाल की प्राथमिकताएं सरकारों के लिए गहरा डर पैदा करती हैं और नेपाल सरकार के लिए आजकल सबसे बड़ा डर सीमा है।बालेन शाह की सरकार के आदेश के बाद भारत से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा पर निगरानी काफी ज्यादा बढ़ा दी गई है, सुरक्षा तंत्र का विस्तार किया गया है और सीमावर्ती इलाके को लगभग एक फौजी इलाके में तब्दील कर दिया गया है। ये सब एक गहरी सोच के ही लक्षण हैं। 2015 के मधेस आंदोलन के बाद यही सोच और भी ज्यादा संस्थागत हो गई जिसमें बातचीत की जगह नियंत्रण ने ले ली और भागीदारी की जगह शक ने।चंद्रकिशोर ने काठमांडू पोस्ट में लिखा है कि कांटेदार तारों या दीवारों के अलावा इस सीमा की पहचान हमेशा से भरोसे, परंपरा और साथ मिलकर रहने की भावना से होती रही है। यह उन लोगों के कदमों से बंधी हुई थी जो हर रोज इसे पार करते थे, बिना पासपोर्ट के, बिना किसी डर के, बिना किसी शक के। सीमा पर सख्त नियंत्रण से असल में किसे नुकसान पहुंचता है? अमीरों को नहीं। जिनके पास संसाधन हैं उन्हें नहीं। बल्कि इसका सीधा नुकसान आम आदमी को होता है जिसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। और यही इस नीति का असली चेहरा है। यह असमानता का ही विस्तार है। आज हमें ‘सीमा पर न्याय’ की जरूरत है। इसीलिए सीमा पर पाबंदियों की मांग अक्सर वही वर्ग करता है जिसे खुद कभी उन पाबंदियों का सामना नहीं करना पड़ता।काठमांडू पोस्ट में चंद्रकिशोर ने बालेन शाह सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि नेपाल-भारत की खुली सीमा कोई कमजोरी नहीं है। यह एक ताकत है। दुनिया इस मॉडल से यह सीख सकती है कि सीमाएं पुल का काम भी कर सकती हैं। यह सीमा एक भावना है और यह सिर्फ दो देशों के बीच ही नहीं बल्कि लोगों के दिलों के बीच भी मौजूद है। और जब तक ये दिल आपस में जुड़े रहेंगे तब तक कोई भी सीमा सचमुच बंद नहीं हो सकतीउन्होंने लिखा है कि आखिरकार यह सवाल सिर्फ सीमा नियमों का नहीं बल्कि राज्य के चरित्र का है। क्या हम एक ऐसा नेपाल बनाना चाहते हैं जहां सुरक्षा के नाम पर आजादी पर पाबंदी लगा दी जाए? या एक ऐसा नेपाल जहां सीमाएं और संभावनाएं दोनों ही खुली रहें? इसका जवाब हमें ही तय करना है। क्योंकि सीमा सिर्फ भूगोल नहीं है—यह हमारे लोकतंत्र का आईना है
