

रिपोर्ट्स के अनुसार, दार्जिंलिंग लहराते पहाडों के बीच बसा हुआ शहर है। यहां चमचमाता पर्वत कंचनजंगा नीले आसमान में साफ दिखता है। हरे-भरे पहाड़ों और प्रकृति की खूबसूरती और प्यार से इस जिले को ‘पहाड़ियों की रानी’ कहा जाता है। यह शहर दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का घर भी है। यह रेलवे एक विश्व धरोहर है और आज भी पुराने भाप वाले इंजन पहाड़ों पर चढ़ते हुए नजर आते हैं।दार्जिलिंग का इतिहास काफी रोचक है। आज यह पश्चिम बंगाल का एक प्रमुख जिला है लेकिन इस शहर का इतिहास कई राजाओं और राज्यों से जुड़ा हुआ है। दार्जिलिंग का इलाका पहले सिक्किम का हिस्सा था। 18वीं सदी में गोरखाओं ने सिक्किम पर लगातार हमला किया और इसके कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। 1814 में अंग्रेजों और गोरखाओं के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध हुआ था। गोरखाओं की हार के बाद 1815 में सुगौली संधि के तहत नेपाल ने सिक्किम से लिए हुए इलाकों को अंग्रेजों को सौंप दिया था।1835 में सिक्किम के राजा ने दार्जिलिंग को ब्रिटिशों को उपहार में दे दिया था। तब यह केवल 138 वर्ग मील का छोटा इलाका था, जिसमें आज के दार्जिलिंग और कर्सियोंग शहर शामिल थे। इसके बदले राजा को कुछ हथियार और कपड़े दिए गए थे। ब्रिटिशों ने दार्जिलिंग में बसावट और खेती शुरू की थी।1860 और 1864 में ब्रिटिश ने सिक्किम और भूटान से सीमाओं के विवादों को सुलझाया। 1866 में दार्जिलिंग जिले का आकार लगभग वर्तमान रूप में आया था। स्वतंत्रता के बाद 1947 में भारत की सरकार ने दार्जिलिंग में शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और आर्थिक विकास के कई प्रोजेक्ट शुरू किए थे।1982 से 1988 के दौरान दार्जिलिंग के लोग एक अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। हालांकि, सरकार और ‘गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट’ के प्रमुख सुभाष घीसिंग के बीच एक समझौते के बाद आंदोलन रोक दिया गया। ‘दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल एक्ट’ को पश्चिम बंगाल विधानसभा ने ‘पश्चिम बंगाल एक्ट 13 1988’ के रूप में पारित किया था। सिक्किम और भूटान से विवाद सुलझने पर यह ब्रिटिश भारत में शामिल होकर पश्चिम बंगाल का हिस्सा बन गया
